जनरलगंज हटिया बजाजा कानपुर

जनरलगंज हटिया बजाजा कानपुर के औद्योगिक उत्थान और पतन का हमेशा साझीदार रहा है। शहर की नौ मिलों की चिमनियों से धुआं उगलना बंद कर दिया तो मैं भी संकट में आ गया था। आजादी की लड़ाई हो या फिर सामाजिक आंदोलन, मेरी गोद में पलने वाले मेहनतकशों और कारोबारियों ने हिम्मत नहीं हारी। बदलते दौर के साथ मुङो भी बदला। मारकीन, धोती, पापलीन, रुबिया बेचने वाली फर्म मालिकों ने फैशनेबल परिधानों की ओर रुख कर लिया। अब तो मेरी हर गली में देश के कोने-कोने की साड़ी, सूर्टिग, सर्टिग, सूट की वैराइटी देश भर के कारोबारियों को आकर्षित करती है। अब फर्मो में बही खाता के साथ कम्प्यूटर के केबिन भी नजर आते हैं। कई मंजिला साड़ी टॉवर में हर खंड में नई वैराइटी में अपनी पसंद खोजते ग्राहक नजर आते हैं। सूरत में धाक : लोग मुङो बजाजा के नाम से भी जानते हैं। सूरत तक मेरी धाक है। साड़ी के बड़े-बड़े कारोबारी मेरी मंडी से जुड़े रहने को बेताब रहते हैं। वजह है कि साड़ी बाजार में 60 फीसदी सूरत का ही माल मिलता है। कांजीपुरम, मथुरा, कोलकाता, वाराणसी, जयपुर, असम की साड़ियों की हर वैराइटी यहां उपलब्ध हैं। जरी या डिजाइनर साड़ियों को देश का बड़ा हब हो गया है। भीलवाड़ा की सूर्टिग और बाम्बे की सर्टिग की कंपनियां मेरी मार्केट में खासा कारोबार पा रही हैं। मेरा बाजार आज भी सूती और मारकीन का बड़ा हब है। आज मुङो टॉवरों ने नई पहचान दी है। एक दर्जन से ज्यादा कारोबारी ऐसे हैं, जो साल में अरबों का कारोबार करते हैं। हालांकि शुरू से मेरा रूप ऐसा नहीं था। सिर्फ 50 दुकानों से यहां काम शुरु हुआ। आजादी से पहले मेरी गलियों में दर्जी बहुत थे। कपड़ा सिलते थे। धीरे-धीरे स्वरूप बदला तो बजाजा नौघड़ा की गलियों तक फैल गया। बड़े-बड़े कपड़ा आढ़ती, दलाल का नेटवर्क था। अब तो आसपास की गलियों तक बाजार फैल गया है।

 

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