कानपुर अब ट्राम युग से मेट्रो युग में करेगा प्रवेश


कानपुर। जिले में अगले कुछ सालों में मेट्रो रेल सेवा शुरू हो जाएगी। कानपुर लगभग एक सदी बाद अपने इण्टिग्रेटेड ट्रान्सपोर्ट सिस्टम को अपडेट होते देखेंगा। इतिहास गवाह है कि इस औद्योगिक शहर में सन् 1933 तक ट्राम चला करती थी और इसे दिल्ली से पहले कानपुर में शुरू किया गया था। पत्रिका टीम ने एक सौ दस साल के इस सड़क-रेल यातायात के ऐतिहासिक सफर का जायजा लिया।
सड़कों के धूल धुआ धक्कड़ और जाम में फंस फंस कर चलता यह बेतरतीब यातायात कानपुर की पहचान बन चुका है। अब यहां मेट्रो ट्रेन चलाने की योजना की आधारशिला रखी गयी है तो लोगों को एक बेहतर परिवहन सेवा मिलने की उम्मीद बंधी है। लेकिन बहुत कम लोग जानते होगें कि एक सौ दस साल पहले कानपुर में अंग्रेजों ने इण्टिग्रेटेड ट्रान्सपोर्ट सिस्टम लागू किया था। तब यहां जून 1907 में ट्राम सेवा शुरू की गयी थी जिसने कानपुर को वैश्विक पहचान दी। जब कानपुर को ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अपना सेण्टर बनाया तो उन्होंने आबादी के बढ़ने पर सस्ते परिवहन के रूप में ट्राम चलायी थी। उस दौर में यह सेवा दिल्ली से पहले आयी और ट्रामका डबल ट्रैक कानपुर रेलवे स्टेशन से गंगा नदी के सरसैया घाट तक बिछाया गया। कानपुर में ट्राम का सफर केवल 26 साल चला। इसे जून 1907 में शुरू किया गया तो 16 मई 1933 को बन्द कर दिया गया। उस समय केवल एक रूट पर सिंगल कोच वाली बीस ट्राम चलायी गयी। लगभग चार मील लम्बे इस रूट की खास बात यह थी कि यह शहर के मुख्य आबादी वाले इलाके को पूरी तरह कवर करता था। बाहर से आने वाले तीर्थयात्री ट्राम पर सवार होकर गंगा जी तक पहुंचते थे तो कपड़ा व्यापारी जनरल गंज स्थित मुख्य कपड़ा बाजार।
कानपुर अपनी कपड़ा मिलों के कारण मैनचेस्टर ऑफ ईस्ट का दर्जा हासिल कर चुका था। ऐसे में ट्राम सेवा से यहां के कारोबार को और बढ़ावा मिला। इस ट्राम का उद्देश्य यह भी था कि बाहर से आने वाले तीर्थ यात्रियों को रेलवे स्टेशन से गंगा जी तक पहुंचाया जा सके। इसका एक स्टेशन परेड पर हुआ करता था जिसके कुछ अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं लेकिन यह बहुत कम समय तक चली इसकी मुख्य वजह शहर का विस्तारीकरण रहा।
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इतिहासकार धर्म प्रकाश गुप्ता ने अपने एक शोध में चौंकाने वाला खुलासा किया है। उनके अनुसार विकीपीडिया में भले ही यात्री ट्राम की शुरूआत सन् 2007 दर्ज हो लेकिन अंग्रेज हुक्मरानों ने कानपुर में ट्राम का प्रथम प्रयोग सन् 2002 के आसपास मल निस्तारण यानि सेनिटेशन वर्क के लिये शुरू किया था। तब इसकी लागत 46 हजार रूपये आयी थी। बाद में मैला ढोने वाली ट्राम किस तरह यात्रियों को ढोने लगी, इसकी कहानी भी कुछ कम दिलचस्प नहीं है। पहले यहां सेनीटेशन के लिये जो कूड़ा करकट उठाया जाता था उसके लिये बैलगाड़ियों का इस्तेमाल किया जाता था जिससे काफी गन्दगी फैलती थी। इसलिये सन् 1902 में ट्राम की शुरूआत मल निस्तारण के लिये की गयी और इसके लिये साढ़े पांच मील लम्बा ट्रैक बिछाया गया।
यह व्यवस्था सन् 1906 तक रही। इसके बाद सेनिटेशन के लिये दूसरे इन्तजाम किये गये और ट्राम लाईनें शिफ्ट करके यात्री ढोये जाने लगे।
यूं तो ट्राम सेवा अपने समय का बेजोड़ परिवहन साधन था। इसकी भव्यता का अन्दाज शहर के बीचोबीच बने परेड ट्रामस्टेशन की बुलन्द इमारत से लगाया जा सकता है। हालांकि अब यहां बाजार बन गया है लेकिन स्टेशन की इमारत की छत पर जाने से यहां इतिहास के पदचिन्ह साफ नजर आते हैं। ट्राम की उपयोगिता धीरे धीरे खत्म होती गयी और बढ़ती आबादी के बीच ट्राम चलाना मुश्किल होता था इसलिये जो यात्रा ट्राम से शुरू हुई थी अब मेट्रो पर पूरी हो रही है। अंग्रेजी शासनकाल में कानपुर की महत्ता का अन्दाजा इससे लगाया जा सकता है कि कलकत्ता के बाद कानपुर में ट्राम चलायी गयी। जबकि दिल्ली में ट्राम इसके बाद सन् 1908 में आयी। मद्रास में घोड़े से खींची जाने वाली ट्राम चलती थी जबकि कानपुर में बिजली से चलने वाली। कानपुर में बिजली भी दिल्ली से पहले आयी थी। कानपुर में ट्राम क्यों बन्द कर दी गयी, इस बारे में इतिहास के पन्नों में कुछ भी साफ साफ दर्ज नहीं है। लेकिन जल्दी ही लोगों को ट्राम का मेट्रो अवतार कानपुर की सड़कों पर नजर आयेगा।

 

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