हजारों यात्रियों से गुलजार रहने वाला सेंट्रल स्टेशन रूरा हादसे के बाद गुरुवार को पूरी तरह से सन्नाटे में तब्दील हो गया।

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ट्रैकमैन को आज भी हथौड़े-फावड़े से नहीं मिली आजादी

कानपुर। कैशलेस ट्रांजेक्शन के युग में प्रवेश कराने की भले ही बात हो रही है पर भारतीय रेल के ट्रैक को बिछाने से लेकर उसके परीक्षण कराने तक की पद्धति ब्रिटिशकालीन है। अभी भी ट्रैकमैन हथौड़ा, बेल्चा, फावड़ा झोले में भरकर ट्रैक पर पैदल चलते हैं। रास्ते में एक-एक बोल्ट में हथौड़ा मारकर पता करते हैं कि बोल्ट या पैंडाल क्लिप ढीली है या कसी। हिन्दुस्तान टीम ने कानपुर-इलाहाबाद, दिल्ली,लखनऊ, फरुखाबाद रूटों की पटरियों की चेकिंग प्रणाली को देखा।

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