नौजवान डीएम से ऐसी उम्मीद नहीं थी, नजारा देखकर संगीता बेहोश हो गई


कानपुर. चर्चा तो बहुत थी, लेकिन आज शहर के नए कलेक्टर ने दिखा भी दिया कि आखिर क्यों चर्चा में रहते हैं। बड़े-बड़े अधिकारी आए और चले गए, लेकिन नौबस्ता की संगीता का मामला फाइलों में दबा-कुचला पड़ा था। शायद ही कोई ऐसी जनसुनवाई होगी, जब संगीता अपनी गुहार लेकर शहर के कलेक्टर के पास नहीं पहुंची थी। उसके नसीब में अभी तक सिर्फ आश्वासन और झिड़कियां ही आई थीं। नए जिलाधिकारी सुरेंद्र सिंह की पहली जनसुनवाई में संगीता का मामला तीन दिन में निपटाने का आदेश हुआ तो उसे विश्वास नहीं था कि कोई अफसर इतनी तेजी के साथ भी काम करता है। कुछ देर तो वह डीएम सुरेंद्र सिंह का चेहरा टुकुर-टुकुर देखती रही, फिर बेहोश होकर गिर गई। संगीता जमीन पर गिरी तो डीएम ने खुद दौडक़र उसे उठाया और प्राथमिक इलाज के लिए कर्मचारियों को मुस्तैद किया।
तीन बरस से परेशान थी, अचानक राहत मिल गई
 नौबस्ता की संगीता के पिता सत्यधर्म की नौबस्ता चौराहे के पास चार दुकानें थीं, जिन्हें नेशनल हाई-वे अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने 2014 में अधिग्रहित किया था। मुआवजा तय हुआ था करीब40 लाख रुपए, लेकिन एनएचएआई ने अभी तक सिर्फ साढ़े तीन लाख रुपए ही दिए हैं। शेष रकम के लिए पिता चक्कर लगाते-लगाते थक गए और हारकर घर में छोटी बेटी के साथ बैठ गए। संगीता का ब्याह दिल्ली में हुआ है। बिटिया पढ़ी-लिखी है तो पिता ने उससे मुआवजे का मामला देखने को कहा। संगीता तीन साल से लगातार एनएचएआई और जिलाधिकारी दफ्तर के चक्कर काट रही है, लेकिन खाली हाथ घूमती रही।
तीन दिन में राहत का रास्ता देखकर चौंक गई
 डीएम के सामने जैसे ही संगीता का मामला पहुंचा तो तारीख पर तारीख देखकर वह खुद भी चौंक गए। इसी दौरान संगीता ने किस्सा बताते हुए अपना दर्द बयान किया। वह रोने लगी, डीएम फाइल पलटने में बिजी थे। उन्होंने अपर जिलाधिकारी (भूमि अध्याप्ति) से तीन दिन में रिपोर्ट देकर समाधान करने को कहा। तीन दिन में मामला निबटता देखकर संगीता चौंक गई। उसे तो आज फिर तारीख मिलने की उम्मीद थी। वह एक पल के लिए डीएम का चेहरा देखती रही और बेहोश होकर गिर गई।
कानपुर। वह करीब तीन साल से डीएम दफ्तर में मुआवजे को लेकर चक्कर लगा रही थी। पूर्व डीएम कौशलराज किशोर शर्मा के पास जाकर गिड़गिड़ाई। पीएम को पत्र लिखकर अपना दर्द बयां किया। पीएमओ से पीडि़ता को न्याय दिए जाने को लेकर आदेश आया, फिर भी किसी ने उसकी खबर नहीं ली। हार कर महिला ने सुसाइड का मन बनाया, लेकिन उसे मोहल्ले के एक टीचर ने योगी के नए कलेक्टर के बारे में बताया। महिला डीएम आफिस पहुंची और कलेक्टर के पास हाथ जोड़कर अपनी दास्तां सुना दी। कलेक्टर ने पीडि़ता की बात सुनते ही बाबू को तलब कर तीन दिन के अंदर पूरा भुगतान देने का निर्देश दे दिया। यह सुनते महिला इतना भावविभोर हो गई कि डीएम ऑफिस में ही बेहोश हो गई। महिला कुर्सी पकड़कर बैठ गई तो हड़कंप जैसी स्थिति बन गई। डीएम अपनी सीट से उठे और महिला को पानी पिलाकर सामान्य किया।
क्या था पूरा मामला
नौबस्ता निवासी सुनीता के पिता की चार दुकानें थीं। राष्ट्रीय राजमार्ग पर एलीवेटेड पुल निर्माण के दौरान चारों दुकानें एनएचएआई ने अधिग्रहीत कर ली थी। मुआवजे के तौर पर अभी तक उसे सिर्फ 3.5 लाख रुपए का भुगतान हुआ है। वह कलेक्ट्रेट और एनएचएआई दफ्तर के कई महीनों से चक्कर लगा रही है। प्रधानमंत्री कार्यालय को शिकायत की तो वहां से भी कार्रवाई के आदेश 24 अगस्त 2016 को हुए थे। इसके बावजूद अभी तक भुगतान नहीं हुआ। सुनीता का आरोप है कि एनएचएआई में मुआवजा भुगतान के बदले एक लिपिक ने एक लाख रुपए की घूस भी ले ली। सुनीता अपनी शिकायत लेकर डीएम सुरेंद्र सिंह के पास पहुंची थी। डीएम को बताया कि वह कई वर्ष से कलेक्ट्रेट के चक्कर लगा रही है। एनएचएआई का कहना है कि मुआवजे का भुगतान कलेक्ट्रेट से ही होगा। डीएम ने तुरंत संबंधित क्लर्क को बुलाया और तीन दिन में भुगतान करने का आदेश दिया।
कलेक्टर से मिलते ही भावविभोर हुई पीडि़ता
महिला ने बताया कि अखिलेश सरकार के अफसर बिना चढ़ावे के कुछ करने को तैयार नहीं होते थे। हमारी दुकानें लेने के बाद जब मुआवजा देने का नंबर आया तो तीन साल से डीएम आफिस के चक्कर लगवा रहे थे। इतना ही नहीं पीएमओ से 24 अगस्त 2016 को कार्रवाई का आदेश आया, लेकिन उसे भी टोकरी में डाल दिया गया। एक बाबू ने कहा कि कुछ चढ़ावा दो तो तुम्हें मुआवजा दिलवा दूंगा। हमने उसे एक लाख रुपए दिए। पैसे लेने के बाद वह भी कहीं गुम हो गया। कुछ दिन बाद मिला तो मुंह फेर लिया। लेकिन योगी के नए कलेक्टर साहब ने हमें न्याय दिया।
सबका साथ, सबका होगा विकास
नए डीएम के रूप में कार्यभार ग्रहण करने के बाद सुरेंद्र सिंह के सामने यह पहला मामला आया, जिसे उन्होंने बिना लेटलतीफी के निपटा दिया। डीएम ने कहा कि यूपी में गुड गवर्नेंस का माहौल है, हर व्यक्ति चाहता है उसके शहर में ऐसा माहौल हो। मोदी और योगी ने गुड गवर्नेंस की कल्पना की है। डीएम सुरेंद्र सिंह ने बताया कि उनकी प्राथमिकताओं में हर पीडि़त को तत्काल न्याय मिले, उसे बेवजह सरकारी दफ्तारों के चक्कर न लगाने पड़े। डीएम ने अपने महतमों को दो टूक शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि हर पीडि़त की समस्या को सुनें और गांव, मोहल्ले और कस्बों में उसका निराकरण करें। डीएम के मुताबिक योगी सरकार शिक्षा और स्वास्थ को लेकर बेहद गंभीर है। इन दोनों सेक्टर को लेकर कई फैसले भी सरकार ने लिए हैं। हमें उन्हें जमीन पर उतारने के लिए प्रयास कर रहे हैं।
स्वास्थ और शिक्षा पर रहेगा फोकस
डीएम ने कहा कि, किसी भी शहर का विकास वहां के स्वास्थ और शिक्षा पर ही निर्भर करता है। प्राथमिक एजुकेशन का हाल सबको पता है। प्राइमरी स्कूलों के क्वॉलटि पर ध्यान देना होगा। सरकारी स्कूलों में कॉम्पटीशन की भावना लानी होगी, जो बच्चों के साथ शिक्षकों के अंदर भी हो। तभी हम प्राइवेट स्कूलों को डिफीट दे सकेंगे। हम सरकारी स्कूलों के क्वालिटी को सुधारने के लिए जल्द ही एक एजुकेशन समिति बनाएंगे। उन्होंने कहा, गुड गवर्नेंस के लिए एक्शन, इफेक्टिव और रेगुलर चेंज की जरूरत होती है, जिस पर हम लोगों को काम करना होगा। लोगों को सरकारी सिस्टम से जो हताशा होती है। ये रेस्पांसिबल का नहीं होना और किसी भी काम में डिले होने की वजह से होता है। कानून तो कई बने हैं, लेकिन वो प्रभावी नहीं है, जिस पर हमें विशेष तौर पर काम करना होगा। गुड गवर्नेंस के लिए आउटपुट बेस काम का होना बहुत जरुरी है। इसके लिए कर्मचारियों को नए तकनीकी से अपडेट किया जाएगा।
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