एक ऐसे थानेदार, जो गरीब-असहायों के साथ करते हैं इन बेजुबानों की भी सेवा


कानपुर देहात. अपराध जगत में जब किसी अपराधी को उसके बुरे रास्ते से विरत कर अच्छे रास्ते पर चलने के लिये एक पुलिसकर्मी अपने नेक मापदंड का उपयोग करते हैं, तो लोग कहते हैं कि पुलिसकर्मियों में मानवता कहीं गुम सी हो गयी है। लेकिन हम आपको एक ऐसे पुलिस अफसर से मिलाते हैं, जो धार्मिक आस्था से ओतप्रोत होकर ईष्ट भक्ति के साथ-साथ मानवता के भी पुजारी हैं। अजीतमल, बरौर, रूरा आदि थानों के सेवाकाल में असहायों, गरीबों के साथ न्यायपूर्ण कार्य करते हुए उन्हें सही राह दिखाते रहे हैं। साल 1989 में पुलिस विभाग ज्वाइन करने वाले बृजमोहन चौदह वर्षों से भक्ति भावना में लिप्त होकर प्रत्येक मंगलवार को बालाजी का उपवास रखते हैं और समय मिलते ही मेहंदीपुर बालाजी के दर्शन के लिये भी जाते हैं। उनकी एक खूबी जो मानवता का साक्षात उदाहरण दर्शाती है, वह रोजाना सुबह उठकर थाना परिसर में बेजुबां बतखों के झुंड को दाना चुंगाना और एकाएक सैकड़ों बतखें उनके पास पहुंच जाती हैं। जिससे उन्हें सुकून मिलता है। जिसके बाद वह अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो जाते हैं। उनका मानना है कि राह कितनी भी मुश्किल हो, अगर जज्बा है अपनी रूह में, तो हम आंधियों में भी दीपक जला देंगे। ऐसे विचारों से परिपूर्ण कानपुर देहात के रूरा थाने में तैनात थानाध्यक्ष बृजमोहन वर्मा की तारीफ करते हुये लोग भी नहीं थकते हैं।

पूजा पाठ के साथ असहायों की सेवा उनका ध्येय

आगरा के रहने वाले बृजमोहन रूरा थाने में कार्यरत होकर बेहद सरल स्वभाव व मानवतापूर्ण दृष्टिकोण के चलते लोगों के चहेते बने हुये हैं। उनका कहना है कि वह रोजाना सुबह उठकर अपने इष्ट बालाजी महाराज का पूजा पाठ कर सारी
विघ्न बाधाओं से मुक्त रहते हैं और समूचे दिन थाने में आने वाले पीड़ित, गरीब, असहायों के साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार करके उन्हें पानी पिलाते हैं और उनकी समस्यायें सुनकर निराकरण करते हैं| उनका मानना है एक अपराधी भी इंसान होता है। अपराध गलत है मानव नहीं, अपराध को खत्म करना उनका फर्ज है।

जीवों से प्रेम उनके स्वभाव में शामिल

रूरा थाने के आस-पास करीब एक सैकड़ा बतखें पली हुयी हैं। थानाध्यक्ष रोजाना निजी धन से उनके लिये बाजार से दाना खरीदकर लाते हैं और अपने हाथों से बतखों को चावल, बेसन के सेव आदि अन्य तरह-तरह के दाना प्रतिदिन बदलकर डालते हैं। उनकी आवाज सुनकर सैकड़ों बतखें उनके करीब पहुंच जाती हैं और दाना चुंगने लगती हैं। इस दौरान वह बतखों के साथ हंसते, खेलते हुए सुकून महसूस करते हैं। बतखों के इस झुंड में एक जोड़ा बतख का अलग खड़ा रहता है, जिसे वह अलग से दाना डालते हैं। तब जाकर वह खाती है। यहां मानव संवेदना का ऐसा रूप दिखता है कि आप दंग रह जायें। इस दौरान बेजुबां बतखें बृजमोहन के कहने के अनुसार कार्य करती हैं, जो देखते ही बनता है।

अजीतमल में तैनात होकर लगाया था आम का बाग

मानव जीव जंतुओं के हितैषी होने के साथ-साथ बृजमोहन को वृक्षों से बहुत लगाव है। ये प्रेरणा उनको ईश्वरीय देन है। घर में रहकर वह पेड़-पौधों की देखभाल करते रहे हैं। जिस थाने में रहे, वहां उन्होंने पौधरोपण भी किया। उन्होंने बताया कि औरैया जनपद के अजीतमल थाने में तैनात रहने के दौरान उन्होंने वहां वृक्षारोपण करते हुये करीब 80 आम के पौधे लगाते हुये उन्हें बाग का रूप दिया था और समय निकालकर उसकी रोजाना देखरेख करते थे। वह कहते हैं कि आज यहां आने के बाद उन पौधों की अनदेखी जेहन में खलल पैदा करती है।

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