‘साहित्य निकेतन’ में आज भी मौजूद हैं कानपुर के इतिहास, कला और मनोविज्ञान की शोध पुस्तकें


कानपुरवासियों को यह जानकर हैरानी होगी कि शिवाला में एक ऐसा पुस्तक भंडार बना है जहां कानपुर के इतिहास से जुड़ी ऐसी तमाम किताबें उपलब्ध हैं जिनके बारे में आपने पहले कभी सुना भी नहीं होगा। आजादी के पहले बने ‘साहित्य निकेतन’ पुस्तक भंडार में शहर का इतिहास, पुरातात्विक संपदा, कला-साहित्य, धर्म, रंगमंच, वाद्य यंत्र और खेलों से संबंधित शोध पुस्तकें मौजूद हैं। साहित्य निकेतन की शुरुआत 1938 में श्याम नारायण कपूर ने की थी। श्याम नारायण ने 1934 में केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद मुंशी प्रेमचंद्र के सुझाव पर हिंदी वैज्ञानिक साहित्य लेखन शुरू किया था।

कानपुर में गद्य लेखन का वह स्वर्णकाल

विज्ञान भूषण और विद्या वाचस्पति की उपाधि से सम्मानित श्याम नारायण ने कई सालों तक गणेश शंकर विद्यार्थी के अखबार ‘प्रताप’ में पत्रकारिता भी की। इसके बाद उन्होेंने अलग-अलग विषयों पर 25 से ज्यादा किताबें और हजारों लेख कानपुर के इतिहास को लेकर लिखे। वर्तमान समय में ‘साहित्य निकेतन’ पुस्तक भंडार और प्रकाशन की जिम्मेदारी श्याम नारायण के बेटे मनोज कपूर संभाल रहे हैं। मनोज शहर के मशहूर इतिहासकार, लेखक, प्रकाशक और कानपुरीयम संस्था के संयोजक हैं। हिंदी फिल्मों के जाने-माने गीतकार गोपाल दास ‘नीरज’ की पहली किताब ‘दो गीत’ को साहित्य निकेतन ने ही छापा था।

manoj-kapur-kanpuriyam_1524034311‘कानपुरीयम’ संयोजक मनोज ने किया शोध पुस्तकों का लेखन और संपादन 
शिवाला में 25 जुलाई 1949 को जन्मे मनोज कपूर ने मनोविज्ञान से एम.ए. किया और अपने शहर के इतिहास, दर्शनशास्त्र, चित्रकला और मनोविज्ञान जैसे विविध क्षेत्रों में शोध कार्य किया। ‘कानपुर: स्थापना का इतिहास’, ‘कानपुर कल, आज और कल’,  ‘मालवा में बौद्ध धर्म’, ‘कानपुर चर्चा’, ‘चीनी चित्रकला’ जैसी शोध पुस्तकों का लेखन और संपादन करने वाले मनोज कपूर साल 1995 से ‘कानपुरीयम’ संस्था चला रहे हैं। मनोज बताते हैं कि कानपुर के अरौल और मकनपुर इलाके को इतिहास के झरोखों में बौद्धकालीन अयोध्या कहा जाता है। इस जगह पर महात्मा गौतमबद्ध ने 16वां वर्षावास किया था। मनोज बताते हैं कि कानपुर के मूल में गंगा तट पर बसा ‘कान्हपुर’ ग्राम ही है। ‘कान्हपुर’ ग्राम कब और किसने बसाया, इतिहास के जिज्ञासुओं के लिए यक्ष प्रश्न रहा है।

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किंवदंतियां कुछ कहती हैं और अभिलेख कुछ और बताते हैं। ऐसी स्थिति में कान्हपुर की स्थापना के संबंध में तथ्यों की खोज का काम साल 2000 में उन्होेंने अपने दोस्त श्रीप्रकाश गुप्ता के साथ शुरू किया। 1217 ईसवी में राजा कान्हदेव सिंह ने ‘कान्हपुर’ ग्राम की स्थापना की। वर्तमान में यह पुराना कानपुर का क्षेत्र है। 1419 ईसवी में ‘कान्हपुर’ ग्राम में भैरव मंदिर की स्थापना हुई। इसी तरह 1778 ईसवी में कान्हपुर की पूर्वी सीमा के बाहर से जाजमऊ तक कानपुर 12 गांवों के क्षेत्र में ईस्ट इंडिया कंपनी की छावनी स्थापित हुई थी। 24 मार्च 1803 को सिविल डिस्ट्रिक्ट की स्थापना हुई और कानपुर एक जिले के रूप में अस्तित्व में आया। कानपुरीयम संस्था ने कानपुर के इतिहासकारों और इसका निर्माण करने वालों की याद में 24 मार्च 1995 से कानपुर दिवस मनाने की पहल की थी।

साहित्य के पन्नों पर कानपुर.png

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