कानपुर का महात्मा गांधी जी से गहरा नाता रहा है


कानपुर का नरवल का गणेश सेवा आश्रम आज भी महात्मा गांधी के सपनों को सजोए हुए है। 1934 में यहां महात्मा गांधी आए थे। कनपुरियों ने तब कस्तूरबा ट्रस्ट के लिए 3592 रुपए 13 आना एकत्र करके दिए थे। प्रार्थना सभा के दौरान इकट्ठा किए की गई सहायता राशि में 1541 रुपए उद्यमी कमलापत सिंहानिया ने दिए थे। महात्मा गांधी ने इस धन का एक हिस्सा नरवल आश्रम में कस्तूरबा भवन के लिए दे दिया था।

narwal-kasturba-gandhi-ashram1857 की क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कंपू का गांधी जी से गहरा नाता रहा है। गांधीजी कानपुर कई बार आए। गणेश शंकर विद्यार्थी की अध्यक्षता में 20 फरवरी 1929 को सरदार पटेल के बारडौली संगठन की प्रेरित होकर नरवल सेवा आश्रम की स्थापना की गई थी। गणेश शंकर विद्यार्थी की 23 मार्च 1931 को शहादत हो गई। विद्यार्थीजी की स्मृति में सेवा आश्रम का नाम उनके नाम पर रख दिया गया। महात्मा गांधी 1934 में शहर आए तो आश्रम भी गए, वह यहां कई दिन तक रुके। नगर के कारोबारी, व्यापारी, बुद्धजीवी और अन्य लोगों ने उस समय महात्मा गांधी को पैसा इकट्ठा करके दिया था। गांधी सेवाश्रम पहुंचे तो उन्होंने कस्तूबा भवन के लिए आर्थिक मदद दी। नरवल आश्रम में कस्तूरबा गांधी भी आईं, आश्रम में तिलक हाल की तर्ज पर कस्तूरबा भवन भी बनाया गया।

कई बार आए महात्मा गांधी
21 जनवरी 1920 को स्वदेशी अपनाओ अभियान को धार देने।
9 अगस्त 1921 को महिलाओं औऱ व्यापारियों के प्रतिनिधिमंडलों से मुलाकात।
-23 दिसंबर 1925 को स्वदेशी प्रदर्शनी का उद्घाटन किया।
-1929 दिसंबर को एसोसिए्ट्स प्रेस आफ इंडिया के प्रतिनिधियों से मिले
-22 जुलाई से 29 जुलाई 1934 तक कानपुर में रहे। वह नगर पालिका गए। जिला परिषद के कार्यक्रम में भाग लिया।
24 जुलाई 1934 को तिलकहाल के उद्घाटन समारोह में मौजूद रहे। हरिजन सेवक संघ के कार्यकर्ताओं से मिले।
26 जुलाई 1934 को नरवल आश्रम आए। खादी के प्रांतीय विक्रेताओं से मिले।

तिलकहाल में गूंजा रघुपति राध राजाराम..
गांधी जयंती पर आज भी तिलकहाल में चरखा चलाकर सूत काता जाता है और रघुपति राधव राजाराम के मधुर स्वर गूंजते हैं। तिलकहाल का उद्घाटन गांधी जी ने ही किया था, तब से इसमे कांग्रेस का कार्यालय है। गांधी जयंती को कांग्रेसी और आम जनमानस यहां एकत्र होता है और सभी गांधी जी को याद करते हैं। रविवार को यहां का माहौल अलग था, राजनीति और टिकट पर चर्चा के बजाय गांधी जी पर चर्चा हो रही थी, तिलक हाल में मौजूद पुराने लोग गांधी जी की यादें ताजा कर रहे थे।

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